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  • `राजनीती में ढहता चारित्रिक मापदंड

    `राजनीती में ढहता चारित्रिक मापदंड

       

    राजनीती में चारित्रिक मापदंड

    राजनीती में चारित्रिक मापदंड एक स्वथ्य और लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है | राजनीती में नेता का चरित्र जनता के भरोसे का मुख्य आधार होता है | नैतिक रूप से मजबूत नेता ही समाज में ही सही सन्देश दे सकता है , ईमानदारी और सत्य निष्ठा राजनीतिज्ञों का सबसे बड़ा आभूषण होता है , चरित्रवान नेता सत्ता का प्रयोग निजी स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि जनकल्याण के लिए करते है | राजनीती में पारदर्शिता का अर्थ कार्यो में स्पष्टता और चरित्र में ईमानदारी नैतिक नेतृत्व जनता का राजनीती पर भरोसा बहाल करता है | एक आदर्श नेता को लोभ मोह अहंकार से ऊपर उठकर कार्य करना चाहिए |

    जनप्रतिनिधि वह नीव है जिस पर एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण होता

    चरित्रवान नेता ही युवा पीढ़ी के लिए रोल मॉडल होते है उनकी सुचिता ही  लोकतंत्र मजबूत होता है | सशक्त लोकतंत्र के लिए चरित्रवान जनप्रतिनिधि वह नीव है जिस पर एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण होता है , परन्तु आज की राजनीती में यह सिर्फ सुनने को मिलता है  पर  देखने क़ो बिलकुल मिलता नहीं  है |

    राजनितिक मर्यादा की चिंता नहीं 

    आज हम वैसे ही एक राजनेता की बात करने वाले हैं जिसने राजनीती की मर्यादा की चिंता तो कभी की ही नहीं है |

    गिरिधारी यादव (जन्म 14 अप्रैल 1961) एक भारतीय राजनीतिज्ञ, संसद सदस्य (लोकसभा) और जनता दल (यूनाइटेड) राजनीतिक दल के सदस्य हैं। वे बिहार के बांका लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। यादव चार बार लोकसभा और चार बार बिहार विधानसभा के लिए चुने गए हैं। गिरिधारी यादव समाजवादी  वर्ग के राजनीतिज्ञों से संबंध रखते हैं। वे राजीव गाँधी  के कार्यकाल के दौरान युवा कांग्रेस में थे उसके बाद इनका जुड़ाव वीपी सिंह  जैसे नेताओं से भी रहा | 

     

     

    कटोरिया  विधानसभा की उम्मीद   

    1995 में इन्हे बिहार के कटोरिया विधानसभा से चुनाव लड़ने का मौका मिला और जीत भी हासिल किये | कटोरिया विधानसभा जीतने के बाद इन्होने लोकसभा लड़ने का फैसला किया और बांका लोकसभा शानदार जीत हासिल कर 11 वी लोकसभा के सदस्य बने| 1997 में, गिरधारी  यादव उन सत्रह लोकसभा सांसदों में से एक थे जिन्होंने नई दिल्ली वीपी सिंह की पार्टी जनता दल से  अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया जिसके सुप्रीमो आज तक  घोटाला सम्राट लालू यादव है  | लेकिन वे राजद के टिकट पर 12 वी लोकसभा का चुनाव दिग्विजय सिंह से मामूली 1% से भी कम अंतर से हार गए | लेकिन फिर 2000 में बिहार के कटोरिया से फिर विधायक दूसरी बार चुने गए |

    लोकसभा चुनाव में जबरदस्त प्रदर्शन 

    2004 में, यादव ने दिग्विजय सिंह को हराकर 14 वी लोकसभा  के लिए चुनाव जीता । सांसद रहते हुए आरजेडी द्वारा पार्टी टिकट न दिए जाने के बाद, गिरिधारी यादव का लालू यादव  से मतभेद हो गया  और 2010 में, गिरधारी  यादव जनता दल यूनाइटेड नितीश कुमार जी की पार्टी का दामन थाम लिया और बिहार के बेलहर विधानसभा के लिए निर्वाचित हो गए |  वे 2014 में जनता दल यूनाइटेड  के महासचिव बने । गठबंधन के आरजेडी नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन के साथ मेलजोल के आरोप में नोटिस जारी होने के बाद यादव ने 2015 में इस पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन उन्होंने 2015 में बिहार के बेलहर विधानसभा से चौथी बार निर्वाचित हुए | राजनीती में तोड़ जोड़ मन मर्यादा जनभावना बाद में पहले विधानसभा और लोकसभा में जगह मिले ये सर्वोपरि रहा |

    2019 में उन्होंने रिकॉर्ड बहुमत से बांका से 17 वी लोकसभा के लिए रिकॉर्ड मतों से चुनाव जीता और वित्त सम्बन्धी संसदीय स्थाई समिति में भी अपनी सेवाएं दी | 2024  में फिर बांका लोकसभा से 18 वी लोकसभा  के सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए  |

     

    धितराष्ट्र भी हुए शर्मसार   

    इतने बेमिसाल राजनितिक सफर होने के वावजूद गिरधारी यादव अपनी विरासत क़ो कही न कही वो गरिमा वो प्रतिष्ठा प्रदान करने में नाकाम साबित हो रहे है , गिरधारी यादव अपने कद का इस्तेमाल करते हुए बड़ी मसक्कत के बाद अपने बेटे चाणक्य प्रकाश को राजद से टिकट दिलाने में कामयाब रहे , यहाँ तक तो सब ठीक था परन्तु अपने बेटे को जीत नहीं दिला सके , जबकि आरोप ये लग रहे है की चुनाव के दौरान जनता दल यूनाइटेड के उम्मीदवार मनोज यादव के प्रचार प्रसार में न शामिल होकर अपने जिगर के टुकड़े को कैसे विधानसभा  भेजा जाये उसमे व्यस्त दिखे ऐसा आरोप उनके यानि जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता सुपौल लोकसभा के संसद दिलेश्वर कामत ने लगाया है | इनका साफ कहना है की ये पार्टी विरोधी गतिविधि में शामिल रहे है । और इनकी सदस्य्ता रद्द की जाये | जनता दल यूनाइटेड ने SIR का समर्थन किया था जबकि इन्होने विरोध किया |

    जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता कार्यकारी अध्यक्ष  श्री संजय झा ने भी दिलेश्वर कामत का समर्थन किया और संजय झा ने स्पष्ट कहा की गिरधारी लाल जी का अपने पुत्र चाणक्य प्रकाश को RJD से टिकट दिलाना , और बेटे के लिए वोट मांगना जो साफ साफ दिखाता है की इनकी मनसा पार्टी से अलग होने की है |  

    जनता  दल यूनाइटेड के सबसे वरिष्ठ नेता ललन सिंह ने भी सुपौल के सांसद महोदय का पुरजोर समर्थन किया की और अपनी प्रतिक्रिया देते हुए बोले की गिरधारी लाल यादव कई मौको पर पार्टी गतिविधि में संलिप्त पाए गए है और लोकसभा अध्यक्ष को भी नोटिस दे दिया गया है |

  • क्षत्रिय, क्षेत्रवाद और छलावा

    क्षत्रिय, क्षेत्रवाद और छलावा

    स्वतंत्रता स्वाभिमान के वैश्विक प्रतिमान 

    अपने वतन अपनी मातृभूमि  की रक्षा  के  लिए  अपना सर्वश्वा समर्पित करने वाला क्षत्रिय समाज आज हासिये पर पहुंच चूका है , फिर भी आज की राजनेताओ का जो हमारे वोट लेकर संसद पहुँचते उसका मन दिल नहीं भरता , देश के लगभग       सभी राज्यों में क्षत्रिय समाज अपना एक अलग रुतबा और एक विशिष्ट पहचान रखती है | जैसे हम राजस्थान की बात करे तो आदिकाल से गौरव की भूमि रही है , और इस गौरव को बढ़ाया धरती पुत्र  भारत पुत्र वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने , राजा जय सिंह जैसे वीर योद्धाओ ने  इसी तरह लगभग सभी राज्यों का अपना एक इतिहास है , पर वर्तमान समय में इस इतिहास को धूमिल कर इस समाज को प्रताड़ित करने का अनुचित प्रयास किया जा रहा है | लेकिन अगर इतिहास के दृष्टिकोण से अगर देखे तो  इस समाज को प्रताड़ित करना देश की गरिमा एकता अखंडता को खतरे में डालना है | ये मई बिलकुल तथ्यों को ध्यान में रख कर बता रहा हूँ | कोई ग़लतफहमी में न रहे अगर आपको लगता है तो लगने में कोई बुराई है , लेकिन अगर ऐसा लगता रहा तो लगते लगते  ज़माने की तो जरूर लग जाएगी , अगर ज़माने की लग गई तो पूरी दुनिया मिलके आपको जरूर लगा देगी |

    सबको साथ लेकर चलने की प्रवृति  

    वर्तमान समय में देश में एक से एक कद्दावर  अधिकारी , प्रोफेसर , इंजीनियर , नेता , मंत्री सब भरे पड़े है परन्तु इतना सब होने के वावजूद सबको साथ लेकर चलने की प्रवृति खतम होने का नाम नहीं ले रही , लेकिन एक बात अब इनको समझना पड़ेगा की इनको साथ रखना कोई नहीं चाहता , हाल के कुछ वर्षो में कुछ बड़े नेता उभरकर सामने आये है जिसमे उत्तरप्रदेश के यशश्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी  बृजभूषण शरण सिंह , रघुनाथ प्रताप सिंह जैसे नेताओ ने कमान संभाल रखा है | अगर बिहार की बात करे तो प्रभुनाथ सिंह , आनंद मोहन जैसे बड़े नेताओ के जेल जाने के बाद बिहार की राजनीती में उस समय से सामाजिक राजनितिक धारा कमजोर पड़ चुकी जो कभी अपने तेवर साफगोई और सांगठनिक ताकत के लिए जाने जाते थे उसकी चमक फीकी दिखने लगे , लेकिन इतना जरूर रहा की ये समाज की के दयापात्र नहीं बने , ये अपनी सामाजिक जड़ें अपने वोट बैंक की गोल बंदी और अन्य जातियों के साथ संतुलन बनाकर अपने दम पर खड़ी रही |

     

    मध्यम वर्ग , पिछड़े और अतिपिछड़े वर्ग के साथ राजपूतो का सामंजस्य अच्छा

    और एक जबरदस्त अनुभव शेयर करता हु , जहा जहा  राजपूतो की बहुलता रही वहां वहां  जातीय तनाव की जगह सामाजिक समरसता देखने को मिली , मध्यम वर्ग , पिछड़े और अतिपिछड़े वर्ग के साथ राजपूतो का सामंजस्य अच्छा रहा , जिसकी चर्चा कम होती , लेकिन असर साफ साफ दिखता है , आज भी वो छेत्र जहा राजपूतो की संख्यां कम है लेकिन प्रतिनिधित्व आज भी राजपूत ही कर रहे है , जैसे सारण, महराजगंज , मोतिहारी , शिवहर , विमविसार और अजातशत्रु का वैशाली , बक्सर जैसे छेत्रो में अभी भी दबदबा राजपूतो का है | हालिया चुनावो के परिणामो में राजपूतो का दबदबा जबरदस्त रहा , मौजूदा विधानसभा में 32 विधायक राजपूत समाज से जीत कर आये है | इससे साफ जाहिर है की ये समाज अपने तरीके से हसिये पर नहीं है पर देश के शीर्ष स्थान पर कुछ लोग है ऐसे जो देश में  SC / ST    जैसे काळा कानून लाकर समाज को कमजोर करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है | 

    अक्सर राजपूतो के साथ भेदभाव किया जाता है

    केंद्र हो या राज्य भले ही वैसा प्रतिनिधितव या मान सम्मान न मिल रहा हो जैसे मिलना चाहिए जिसके की हक़दार है | अक्सर राजपूतो के साथ  भेदभाव किया जाता है , कुछ जगह जातीय जनगणना में भी इनकी संख्या को सुनियोजित तरीके से कम कर दिखाने का प्रयास किया गया , सत्ता के गलियारे में हमेशा इनकी ताकत को कम कर दिखाने का प्रयास लगातार किया जाता है | इनसब का एक कारण ये भी रहा की राजनीती में एक लम्बे समय तक कोई ऐसा सर्वमान्य , निर्विवाद , सर्वस्वीकार्य राजपूत चेहरा मौजूद नहीं रहा , वर्तमान समय में इस जगह को देश के रक्षा मंत्री आदरणीय राजनाथ सिंह जी , उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी , राजस्थान के कद्दावर नेता गजेंद्र सिंह शेखावत , बिहार के कद्दावर नेता आदरणीय आनंद मोहन जी , और देश के सबसे ईमानदार कर्तब्यनिष्ठ और साहसी नेता राजकुमार सिंह जैसे लोगो ने संभाल रखा है | 

    70 साल से आरक्षण का दंश झेल रहे क्या कम था

    आज मैं अपने लेख से इनसभी जननेताओं से अपील करना चाहते अगर आप जैसे नेता अगर संसद में मौजूद है तो SC/ST एक्ट UGC  जैसे एक्ट पास कैसे हो रहे है ????? मुझे समझ में नहीं आ रहा 70 साल से आरक्षण का दंश झेल रहे क्या कम था ???? जो ऐसे ऐसे कला कानून पास कर अपने बच्चों के  भविष्य के साथ खिलवाड़ करने दे रहे , क्यों अपंग बनाने में सहयोग कर रहे आपलोग क्यों नहीं विरोध करने की हिम्मत जुटा पा रहे आपलोग ???? आज समय आ गया है की आप लोग एक जुट होकर अपनी ताकत दिखाइए |

    देश में बैकडोर से शरिया नहीं बल्कि कलेक्टिव गिल्ट का कानून लागु हो गया है | जो अंग्रेजो  के कला कानून ” रोलेट एक्ट ” की याद दिला रही , देश की सबसे बड़ी शैक्षणिक संस्थान UGC  प्रमोशन ऑफ़ इक्वलिटी इन हायर एजुकेशन एक्ट 2026 लागु कर दिया | नाम बड़ा ही सॉफ्ट लग रहा पर मनसा एकदम खतरनाक है |

    इस कानून के तहत SC , ST  OBC जिसमे मुस्लिम जातियां भी शामिल है को जनम से ही पीड़ित शोषित घोषित कर दिया गया है | और जनरल कास्ट को जनम से अपराधी मन लिया गया है , अब बड़े बड़े स्कूलों विश्वविद्यालयो में न्याय नहीं पहचान के आधार पर फैसला होगा 

    SC/ST/OBC छात्र को अगर जाती सूचक शब्द महसूस हो जाये तो या व्यबहार प्रतिकूल लग जाये तो या मानवीय गरिमा को ठेस लग जाये तो 

    सामने वाला सवर्ण छात्र अपनेआप आरोपी बन जायेगा सबूत की कोई जरुरत नहीं | मेरे हिसाब से ये कानून नहीं एक नंगी तलवार की तरह है जो सिर्फ एक ही वर्ग के सिर लटकेगी 

    इसके दुष्परिणाम :-

    कोई मेधावी छात्र को आसानी से झूठे केस में फसा कर उनका कररियर वर्वाद किया जा सकता है | 

    नोट्स नहीं दिया तो अपमान , फिल्म राजनीती या इतिहास पर डिबेट गरिमा का हनन , प्रोफेसर ने कम नंबर दिए बेसक से मूल्याङ्कन सही भी होगा तो तो इसको जातिगत भेदभाव माना जायेगा | 

    अब तर्क नहीं भावना चलेगी और भावना ही निर्णय करेगी , यह समानता के नाम पर सविधान का गाला घटना है | इतिहास इसे सामाजिक सुधार नहीं सामजिक बिभाजन का औजार मानेगी | संविधान बनाते समय अम्वेडकर जी जो जहर वो गए आज वो सामाजिक कैंसर का रूप धारण कर चूका है | और मोदी सरकार और जहरीला बीज वो रहा जो देश में गृहयुद्ध की पृष्ठ भूमि तैयार करेगा , मेरी विनम्र अपील वर्तमान  मोदी सरकार इस बिल को अविलम्ब रद्द करे|

     

  • एनिमल’ ने बनाया रातोंरात स्टार जानिए कौन है – तृप्ति डिमरी

    अब तृप्ति डिमरी ने अपने को – स्टार और कई बॉलीवुड हस्तियों को पीछे छोड़ आईएमडीबी की रेटिंग लिस्ट में टॉप 20 में अपनी जगह बना ली

    तृप्ति डिमरी का प्रारंभिक जीवन

    तृप्ति डिमरी जन्म 23 फरवरी 1994  को हुआ|उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल की रहने वाली हैं| इनके माता जी का नाम मीनाक्षी

    और पिता जी का नाम दिनेश है|एक साक्षात्कार में बोली की हमारे माता-पिता ने हमेशा मेरा साथ दिया, मेरे करियर को आगे

    बढ़ाने में काफी सहयोग और समर्थन किया है।

    डिमरी ने अपनी स्कूली शिक्षा दिल्ली पब्लिक स्कूल से की और श्री अरबिंदो कॉलेज इवनिंग से अंग्रेजी ऑनर्स में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। बाद में स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद वह फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे में अभिनय करने चली गईं।

    एक भारतीय अभिनेत्री हैं जो कि हिंदी फिल्मो  में काम करती हैं। उन्होंने कई पीरियड फिल्मों में जैसेबुलबुल (2020) में अभिनय किया।

    Contents

    तृप्ति डिमरी का प्रारंभिक जीवनडिमरी की संघर्ष की कहानीसफलता का राजएनिमल ने सनसनी अदाकारा डिमरी के  कॅरियर को दिया नया आयाम

    डिमरी ने अपने अभिनय जगत की शुरुआत श्रेयस तलपड़े  के निर्देशन में बनी 2017 की कॉमेडी फिल्म पोस्टर बॉयज के साथ की, जिसमें सनी देओल  और तलपड़े ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। यह मराठी  फिल्म पोस्टर बॉयज़ की एक आधिकारिक पुनर्निर्माण था इसमें उन्हें तलपड़े की प्रेमिका के रूप में दिखाया गया था। उनकी अगली फिल्म इम्तियाज अली की 2018 की रोमांटिक  ड्रामा लैला मजनू में अविनाश तिवारी  के साथ एक प्रमुख भूमिका में दिखाई दी|

    डिमरी की संघर्ष की कहानी

    डिमरी ने नायिका के रूप में अपनी सफलता हासिल की, अन्विता दत्त की 2020 की अलौकिक  थ्रिलर बुलबुल में जिसमें उनके साथ राहुल बॉस , पाओली डैम , अविनाश तिवारी  और परमब्रत चटर्जी  भी थे। अनुष्का शर्मा  द्वारा निर्मित, इस फिल्म को आलोचकों और दर्शकों से सकारात्मक स्वागत मिला, जिसमें नारीवाद पर अपने रुख के लिए विशेष रूप से मुख्य भूमिका के लिए डिमरी के प्रदर्शन को सहारा गया।

    सफलता का राज

    न्यूज़ पेपर ” द हिन्दू ” की लेखक नम्रता जोशी ने लिखा, “कमजोर और मासूम से लेकर रहस्यमय रुप में परिवर्तन तक, डिमरी एक अच्छी अदाकारा है जो अपनी आँखों से बहुत कुछ बोलती है। और दर्शक आनंद उठाते हैं।” उनके प्रदर्शन ने उन्हें एक वेब ओरिजिनल फिल्म में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर ओटीटी अवार्ड भी  दिलाया।

    डिमरी ने बुलबुल की टीम के साथ उनके अगले होम प्रोडक्शन काला  के लिए फिर से काम किया। इस फिल्म को आलोचकों और दर्शकों द्वारा उसके प्रदर्शन, निर्देशन, पटकथा, छायांकन, उत्पादन डिजाइन और दृश्य शैली के लिए सकारात्मक समीक्षा प्राप्त हुई। 2022 के बेहतरीन प्रदर्शन में से एक के रूप में इस फिल्म की सराहना करते हुए कई आलोचकों ने डिमरी के प्रदर्शन की अत्यधिक प्रशंसा की गई।

    एनिमल ने सनसनी अदाकारा डिमरी के  कॅरियर को दिया नया आयाम

    रणवीर कपूर के साथ फिल्म एनिमल में काम करने के बाद एक्ट्रेस तृप्ति डिमरी इन दिनों काफी सुर्खियों में बनी हुई हैं। इस फिल्म ने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया है जिससे उनकी फैन फॉलोइंग में भी इजाफा हुआ। अब एक्ट्रेस ने अपने को-स्टार और कई बॉलीवुड हस्तियों को पीछे छोड़ आईएमडीबी की रेटिंग लिस्ट में टॉप 20 में अपनी जगह बना ली है।

  • बिहार चुनाव एक ऐतिहासिक सन्देश

    बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए 200 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की | इस अभूतपूर्व सफलता के केंद्र में राज्य की महिलाएं रही, जिन्होंने रिकॉर्ड 71.78% मतदान कर नीतीश सरकार की महिला-केंद्रित योजनाओं पर भरोसा जताया. 10,000 रुपये की सीधी सहायता, लखपति दीदी और जीविका मॉडल जैसे जैसे कार्यक्रमों ने महिला वोटरों का मजबूत समर्थन एनडीए के पक्ष में सुनिश्चित कर दिया |

    बिहार में एनडीए के इस लैंड मार्क विक्ट्री और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बादशाहत के पीछे सबसे बड़ा कारक राज्य की महिला वोटर बनकर उभरी हैं | लगभग दो दशकों से महिलाओं को ध्यान में रखकर चलाई जा रही योजनाओं का राजनीतिक फायदा एक बार फिर नीतीश कुमार को मिलता दिख रहा है |

    10,000 रुपये की सीधी आर्थिक सहायता गेम चेंजर

    इसके उलट, त्योहारी सीजन से पहले नितीश कुमार का बड़ा मास्टरस्ट्रोक सामने आया जब हर महिला के खाते में 10,000 रुपये की सीधी आर्थिक सहायता दी गई, लगभग 25 लाख महिलाओं को सीधे लाभ और करीब दो करोड़ वोटरों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालने वाली इस योजना ने चुनावी माहौल ही ही बदल दिया, तत्काल आर्थिक राहत और खर्च करने की शक्ति मिलने से महिला वोटरों में सरकार के प्रति भरोसा और मजबूत हुआ.

    ‘लखपति दीदी’ कार्यक्रम

    इसके साथ ही ‘लखपति दीदी’ कार्यक्रम ने महिलाओं को स्वरोजगार, बाजार से जुड़ाव, प्रशिक्षण और लोन के अवसर देकर आर्थिक रूप से सशक्त करने का काम किया, यह यह कार्यक्रम ग्रामीण महिलाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ और उसने नीतीश सरकार के प्रति एक वफादार वर्ग तैयार कर दिया|

    पहले चरण के मतदान (6 नवंबर) के के दौरान छपरा के रसूलपुर में वोट डालने पहुंचीं रेखा देवी का बयान महिलाओं के मूड की स्पष्ट तस्वीर पेश कर दी, उन्होंने कहा ‘यह हमारा अधिकार है आज के दिन घर के काम से ज्यादा जरूरी वोट डालना है| हमें अपने भविष्य का फैसला खुद करना चाहिए | यानि हम कह सकते की

    “पहले मतदान फिर जलपान “

    का नारा काफी असरदार दिखा |

    जीविका समूह मॉडल

    नीतीश कुमार की महिला सशक्तिकरण छवि वर्षों से स्थिर और मजबूत रही है| मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, पंचायत और नगर निकायों में 50% आरक्षण, पुलिस भर्ती में 35% कोटा, और ग्रामीण महिलाओं को बदलने वाला जीविका समूह मॉडल, इन सभी ने महिलाओं को न सिर्फ आर्थिक रूप से बल्कि सामाजिक और और राजनीतिक रूप से भी मजबूत बनाया |

    सशक्त महिलाओं ने चुना सशक्त नेतृत्व

    सुपौल, किशनगंज और मधुबनी जैसे जिलों में महिला वोटरों की भारी मौजूदगी ने भी ये संदेश साफ कर दिया कि बिहार की राजनीति में महिला वर्ग अब निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं. 2025 के रुझान साफ बताते हैं कि जो महिलाएं सशक्त होंगी, वही नेतृत्व को सशक्त बनाएंगी | और इस बार महिलाओं ने एकजुट होकर नीतीश कुमार पर अपना भरोसा जताकर बिहार की राजनीति की दिशा बदल दी |

  • वैभव सूर्यवंशी एक चमकता सितारा

    वैभव सूर्यवंशी का जन्म बिहार के समस्तीपुर जिलाअंतर्गत मोतीपुर गांव में हुआ है,वैभव सूर्यवंशी का जन्म राशि धनु है , और इसका जन्म पूर्वाषा नक्षत्र में हुआ है , जयोतिष साश्त्र के अनुसार यह नक्षत्र शुक्र ग्रह के द्वारा शासित है , जन्मकुंडली में मंगल सूर्य वृहस्पति और बुध की मीन राशि में युति नीच भाग में राजयोग का निर्माण करती है|

  • प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं जानिए कौन है : प्रिया बक्शी

    मैं जो भी भूमिका निभाती हूं, वह खुद को एक नई दुनिया में डुबोने, मानवीय भावनाओं की गहराई का पता लगाने और दर्शकों के साथ गहरे स्तर पर जुड़ने का माध्यम समझती हूँ |

    बॉलीवुड के उभरते सितारे का परिचय

    प्रिया बख्शी जो एक मॉडल और अब अभिनेत्री है , इनका जन्म और पालन-पोषण दिल्ली में हुआ और वह फ़िलहाल मुंबई में रहती हैं| 14 साल की उम्र में अपने करियर की शुरूआती दौर में बहुत सारे शोज करती थी, काफी संघर्ष के बाद दिल्ली टाइम्स जैसे विभिन्न प्रतिष्ठित शो में भाग लेने का मौका मिला और टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए एक पेशेवर मॉडल के रूप में कई फैशन वीक में भी काम किया।

    अभिनय की भूख

    अभिनय को सीखने को उत्सुक प्रिया ने छह महीने तक थिएटर कक्षाओं में भाग लेकर अपने कौशल को निखारा। उनका समर्पण तब रंग लाया जब उन्हें प्रोजेक्ट “जेएनयू” में एक सीपीआई नेता की बेटी प्रजीता डी राजा की भूमिका मिली। अपने प्राकृतिक आकर्षण और शिल्प के प्रति जुनून के साथ, प्रिया अपने प्रदर्शन से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने को बेताब है |

    कमसिन उम्र में बड़े नाम की हक़दार बनी

    प्रिया बक्शी ने छोटी उम्र में ही अभिनय के प्रति अपने जुनून को पहचान लिया था। मनोरंजन की दुनिया में उनका सफ़र स्थानीय थिएटर प्रस्तुतियों से शुरू हुआ, जहाँ उनकी प्रतिभा और समर्पण ने उन्हें जल्द ही इंडस्ट्री में पहचान दिलाई। वह मॉडलिंग इंडस्ट्री का भी जाना-माना चेहरा रही हैं। अपने दृढ़ निश्चय और उत्कृष्टता की निरंतर खोज से प्रेरित होकर, प्रिया ने अपने हुनर ​​को निखारने के लिए बॉलीवुड का रुख किया , जो अंततः उन्हें सिल्वर स्क्रीन तक ले गई। नई दिल्ली की जीवंत गलियों से आने वाली प्रिया अब मुंबई के हलचल भरे महानगर को अपना समझने लगी है और एक ऊँची उड़ान के लिए अपने आप को पूरी तरह से तैयार कर चुकी है |

    हरेक किरदार के प्रति भाव

    मैं जो भी भूमिका निभाती हूं, वह खुद को एक नई दुनिया में डुबोने, मानवीय भावनाओं की गहराई का पता लगाने और दर्शकों के साथ गहरे स्तर पर जुड़ने का माध्यम समझती हु। हर भूमिका एक यात्रा है, और मैं अपने हरेक भूमिका में अपना दिल और आत्मा डाल देता हु । मुझे उम्मीद है कि दर्शक उसी गहराई और भावना को महसूस करेंगे यही सिनेमा की शक्ति है ।

    प्रिया का चरित्र वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है, जिसमें 2016 की एक विवादास्पद घटना भी शामिल है, जिसमें दिल्ली पुलिस ने जेएनयू परिसर में एक कार्यक्रम में उनकी संलिप्तता का आरोप लगाया था, जिसमें “राष्ट्र-विरोधी” नारे लगाए गए थे।
    जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने इस प्रोजेक्ट को स्वीकार करने से पहले दो बार सोचा था, तो प्रिया ने कहा, “यह मेरी पहली बॉलीवुड फिल्म प्रोजेक्ट है और एक कलाकार के रूप में मैंने इसे एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा। मैं इस चुनौती और ऐसी फिल्म का हिस्सा बनने के अवसर को लेकर उत्साहित थी जो ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों से निपटती है। इसलिए, नहीं, मैंने दो बार नहीं सोचा – मैं इस भूमिका को स्वीकार करने और अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए उत्सुक थी।”

    फिल्म  J  N U में शानदार अभिनय का दावा

    जेएनयू अभिनेत्री प्रिया बख्शी को लगता है कि आज की फिल्में ‘सेंसरशिप की चुनौतियों’ का सामना कर रही हैं, उन्होंने ‘अधिक समावेशिता’ की मांग की |अभिनेत्री ने आज की फिल्मों पर चिंता व्यक्त की और कहा, “आज का फिल्म उद्योग अविश्वसनीय रूप से विविधतापूर्ण और गतिशील है। बहुत सारी अलग-अलग आवाज़ें और कहानियाँ बताई जा रही हैं, जो शानदार है। हालाँकि, इसे सेंसरशिप और अधिक समावेशिता की आवश्यकता के साथ चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।
    इस फिल्म में रवि किशन, पीयूष मिश्रा, विजय राज, सिद्धार्थ बोडके, उर्वशी रौतेला, रश्मि देसाई, अतुल पांडे और सोनाली सैगल जैसे कलाकार शामिल हैं। जेएनयू को महाकाल मूवीज द्वारा प्रस्तुत किया गया है और प्रतिमा दत्ता द्वारा निर्मित है ।

  • भ्रूणहत्या एक सामाजिक, मानवीय अपराध है

    भ्रूण हत्या एक उपमृत्यु है।

    मरण के सभी संस्कार से भ्रूण वंचित रह जाता है।

    भ्रूण हत्या मानवीय रचना का संहार है |

    आज हमारे घर परिवार  समाज में भ्रूण हत्या एक सामान्य सी  बात हो गई है। इस देश की लाखों करोड़ो  मातायें बहने अपने पेट में पल रहे बालक  बालिका शिशु की अपने हाथों से भ्रूण हत्या करती है और  करवाती है। खासकर बालिकाओ का गर्भपात का प्रतिशत 90% के लगभग रहता है |  गर्भपात नाम का यह संक्रामक रोग हमारे समाज की माताओं बहनो को भी लग गया है। आज घर—घर में बूचड़खानें खुले हैं  जहा रोज़ अनगिनत हत्याएं हो रही है | मई दावे के साथ कह सकता हु ,कोई घर ऐसा नहीं बचा है जहां एक या दो या इससे अधिक गर्भपात नहीं करवाये गये हैं

    भ्रूण हत्या मानवीय रचना का संहार है |

    भ्रूण  हत्या क्यों होती है ? संसार में आने से पहले विदा कर देनाभ्रूण हत्या मातृत्व के माथे पर कलंकसोनोग्राफी का दुरूपयोगभ्रूण हत्या से मातृ जीवन पर घोर संकट  पेट की सफाई कुदरत की संरचना के खिलाफ  लड़ाई

    भ्रूण  हत्या क्यों होती है ?

    इंसान चाहता क्या है कि भ्रूण  को समाप्त करने से हमारा जीवन सुखी रहेगा? लड़की होने से क्या उसके जीवन में संकट आ जायेगा, वह दु:खी हो जायेगा? यह सब कोरी कल्पना है और  मनुष्य की एक विकृत मानसिकता का परिचायक है। आजकल समाज में इस विकृत मानसिकता के शिकार बहुत लोग हो रहे हैं। आये दिन सरकारी अस्पतालों एवं निजी चिकित्सालयों में देखने को मिलता है कि पैसे के लोभ में अच्छे सुशिक्षित डाक्टर एवं नर्सें यह घृणित कार्य  बड़े पैमाने पर कर रही  हैं। सबसे बड़ी गलती तो उन मां—बाप की होती है जो अपनी ही संतान को जन्म लेने के पहले पैसे देकर उसकी हत्या करवा देते हैं।

    संसार में आने से पहले विदा कर देना

    संसार में आने के पहले ही नष्ट करवा देना कहा तक जायज़ है मैं ये पूछना चाहता हु ? और इससे पहले तो उस मां को सोचना चाहिए जो एक नारी है। जिसे  वात्सल्य और ममता की देवी कहा जाता है। अपनी ही संतान, अपनी ही नस्ल एवं अपने ही जिगर के टुकड़े को नष्ट करवा रही है। कभी यह सोचा है कि आखिर इस अबोध बच्ची का क्या दोष है ? इसलिये कि वह एक लड़की है ? लड़की का प्रेम माता—पिता में लड़के की अपेक्षा अधिक रहता है। बालक प्रकृति की गोद में प्रस्फुटित नन्ही मासूम कली है जिसे हमें फूल की तरह खिलाना है ताकि उसकी खुशबू से हमारा सारा चमन महक सके। ये नन्हें सुकोमल बच्चे तो उस गीली माटी की तरह हैं जिन्हें हम चाहे जैसा गढ़ सकते हैं।

    भ्रूण हत्या मातृत्व के माथे पर कलंक

    भ्रूण हत्या मातृत्व के माथे पर एक ऐसा कलंक है जो नारी की करूणा और संवेदनशीलता को भीतर ही भीतर खोखला किये जा रही है। मातृरूपी जगत जननी नारी आज दिन के उजाले में अपने ही गर्भस्थ कन्या शिशु के खून से अपने हाथों को रंग रही है। कई बार तो गर्भापात करवाते समय इतना खून बह जाता है कि जान बचाने के लिए अतिरिक्त खून चढ़ाना पड़ता है। यह कैसा पुत्र मोह जो अपनी जान से भी प्यारा है। बेटे की चाहत का मीठा जहर कहीं जिंदगी कर कहर न बन जाए। फिर भी संतान के रूप में औरत की पहली पसंद बेटा ही है। पुत्र उत्पन्न होगा, कमायेगा—अर्थव्यवस्था को सहारा देगा। पुत्री उत्पन्न होगी तो अपने साथ घर की लक्ष्मी भी ले जाएगी।

    सोनोग्राफी का दुरूपयोग

    सोनोग्राफी का विकास मात्र मानव कल्याण के लिए किया गया था ताकि अजन्मे शिशु की विकृतियों को जानकर उनका उचित उपचार किया जा सके, किन्तु मानव मन की विकृतियों ने इस पद्धति को व्यापार बना डाला और हर गली में स्थित नर्सिंग होम में भ्रूण  हत्या का निर्मम व्यापार सुनियोजित तरीके से होने लगा और भ्रूण परीक्षा प्रणाली में बलि का बकरा बन रही हैं बेचारी कन्याएं। कभी यह सुनने में नहीं आता कि गर्भस्थ शिशु लड़का था और उसकी गर्भ में हत्या करवा दी हो।

    भ्रूण हत्या से मातृ जीवन पर घोर संकट

    भ्रूण हत्या एक उपमृत्यु है। मरण के किसी संस्कार से भ्रूण वंचित रह जाता है। यहीं एक मरण है (गर्भपात) जिस पर शोक प्रकट नहीं किया जाता है वरन प्रसन्नता ही प्रकट की जाती है। इस युग की देखो चतुराई, हत्या करके कहे सफाई। यह हत्या नहीं यह तो पेट की सफाई है। पिछले दस—बीस वर्षों में जितने भी गर्भपात हुए हैं उनमें 90%  कन्याएं रहती है । क्या अंतर रह गया है 16  वीं शताब्दी के काले युग में और आज के वैज्ञानिक युग में । तब पैदा होते ही लड़कियों का गला घोंट दिया जाता था और आज पैदा होने से पूर्व ही मां की कोख में मौत की नींद सुला दिया जाता है। भारत में गर्भापात के कारण 50  लाख अजन्में बच्चे माताओं द्वारा स्वयं ही मार दिये जाते हैं। हाल ही में गर्भपात के समय पांच लाख माताओं की मृत्यु  भी हुई। गर्भपात के कारण बहुत सी मातायें दुबारा मां बनने से वंचित रह गई।

    पेट की सफाई

    वैसे देखा जाए तो अप्रत्यक्ष रूप से बालिका शिशु हत्या की मंडी में मां ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। मां के जीवन रूपी सिक्के के दो पहलू हैं— पुत्र के लिये ममता की छांव और पुत्री के लिये मौत का पैगाम। बच्चे की तनिक सी पीड़ा से जिस मां का ममता भरा दिल आहत हो जाता है वही मां आज इतनी पत्थर  हृदय कैसे हो गई । एक मां जब छह महीने के बालक की मृत्यु होने पर कितने करूण रूदन करती है और वही मां जब पेट में पल रही शिशु की हत्या डाक्टरी शस्त्रों से करवाती है तो कितनी खुश होकर अस्पताल से लौटती है। समझ से बाहर की बात है।इच्छित संतान आधुनिक शिष्ट और सभ्य समाज की पहचान बन गई है। अजन्मी बालिका शिशु का वध, आज के सभ्य समाज का फैशन बन गया है। नारी की आंखों में जो वर्षों की दास्ता का धुंधलापन छाया है वह उसे पुत्र मोह की चाह में कुछ देखने को नहीं देता |

    कुदरत की संरचना के खिलाफ  लड़ाई

    यह अन्याय कब तक रूकेगा— यह प्रश्न आज हवा में झूल रहा है। एक बात और बेटी को जन्म देने व जिंदा रखकर पाल—पोसकर बड़ा करना जिन लोगों को नागवार लगता है वे बहू की इच्छा किस अधिकार से करते हैं। अपने घर में तो लड़की जन्म ही न ले और दूसरों के घर में पली पलाई बेटी बहू के रूप में मिल जाए। अगर इस तरह से बालिका शिशु हत्याओं का कत्लखाना इसी रफ्तार में चलता रहा तो लक्ष्मी बहू और पुत्र रत्न को जन्म देने वाली माताएं क्या स्वर्ग लोक  से उतर कर पृथ्वी पर आएंगी। हमारा इतिहास इस बात का साक्षी है कि पूर्व में भारत में बहुत सी महिलाओं ने पुरूषों से अधिक ख्याति प्राप्त की है। जैसे लक्ष्मीबाई, जीजाबाई, मीराबाई आदि ये सब इसी युग की महिलाएं हैं, मगर उस समय भ्रूण हत्या होती तो शायद ही ऐसी कर्मयोगी महिलाएं जन्म लेती जिसका नाम बड़े गर्व एवं सम्मान से लेते हैं। इसीलिए सभी माताओं —बहनों एवं भाईयों से हमारा विनम्र निवेदन है कि भ्रूण हत्या को रोकने के लिए सभी वर्गों के लोग सामने आयें और इस भयानक सामाजिक बुराई को समूल नष्ट करवाने में एक दूसरे की मदद करें

  • दिल्ली में नौटंकी अपने शबाब पर – क्या दिल्ली वाले डमी मुख्यमत्री ने ही किया खेल ख़राब ?

    भ्रष्टाचार डूबा तो नहीं दी AAP  का साम्राज्य ?

    दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का दोहरा चरित्र

    आतिशी को दिल्ली का मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने काफी सोच समझ कर ही बनाया होगा – लेकिन सवाल ये है कि अरविंद केजरीवाल की आगे की राजनीति के लिए ये, आतिशी’ पारी कितनी फायदेमंद होने वाली थी, सब साबित हो गया

    आतिशी ने जीता केजरीवाल का दिल

    अरविंद केजरीवाल ने आतिशी को कमान तो मनीष सिसोदिया के जेल जाते ही सौंप दी थी, खुद जेल जाने के बाद तो भरोसा करना मजबूरी थी, लेकिन जेल से छूटने के बाद  जिम्मेदारी को औपचारिक रूप दे देना ज्यादा महत्वपूर्ण है |ऐसा लगता है, अरविंद केजरीवाल ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है, बशर्ते ये निशाना आने वाले दिनों में वास्तव में सटीक भी साबित हो? अगर आतिशी की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाया गया होता तो बीजेपी और कांग्रेस उसे भी वैसे ही टारगेट करते जैसे अरविंद केजरीवाल हरदम ही दोनो राजनीतिक दलो के निशाने पर होते हैं|आतिशी को मुख्यमंत्री बनाकर अरविंद केजरीवाल ने विरोधियों के हमले की धार कम करने की कोशिश तो की ही है, क्योंकि अरविंद केजरीवाल या मनीष सिसोदिया के मुकाबले आतिशी को निशाना बनाना विरोधियों के लिए थोड़ा मुश्किल तो होगा |

    घटना  के बाद से अपने ही साथियों के खिलाफ हमलावर हो गई हैं| स्वाति मालीवाल के आतिशी पर हमले के फौरन बाद ही आम आदमी पार्टी ने इस्तीफा मांग लिया था | स्वाति मालीवाल केस में आतिशी ही अब तक अरविंद केजरीवाल का पक्ष रखती आई हैं|  स्वाति मालीवाल पर आतिशी ने ही आप का आधिकारिक स्टैंड भी बताया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि स्वाति मालीवाल बीजेपी के हाथों में खेल रही हैं|

    दिल्ली में बीजेपी का मास्टर स्ट्रोक

    दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ बीजेपी मनोज तिवारी, प्रवेश वर्मा और चुनावों में अनुराग ठाकुर जैसे नेताओं को मोर्चे पर लगाया था, लेकिन 2020 में वो फिर से भारी बहुमत से जीत गये | अब आतिशी के खिलाफ भी वही नैरेटिव गढ़ने की कोशिश चल रही है, जो अरविंद केजरीवाल के  खिलाफ दिल्ली ही नहीं पंजाब में भी नाकाम हो चुकी है| लोकसभा चुनाव के जरिये बीजेपी ने बांसुरी स्वराज को दिल्ली के मोर्चे पर तैनात किया है| दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी अब दिल्ली से संसद पहुंच चुकी हैं| ये आगे आने वाले समय में बड़ा मास्टर स्ट्रोक हो सकता है |

    बांसुरी स्वराज के आने से आप पर मानसिक दवाब

    बांसुरी स्वराज आते ही अरविंद केजरीवाल पर हमलावर हो गई थीं, अब  आतिशी को टारगेट करना उनके लिए उतना  ही आसान होगा – और चुनावों में अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी पिछले चुनावों की तरह कैंपेन करते हैं, तो अरविंद केजरीवाल का जीतना आसान तो नहीं ही होगा |आतिशी को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने का एक बड़ा फायदा तो अरविंद केजरीवाल के लिए यही होगा

    राजनीतिक और प्रशासनिक स्वछंदता का आभाव

    देखा जाये तो आतिशी ने लंबा प्रशासनिक अनुभव हासिल कर लिया है. 2020 में पहली बार विधायक बनने के बाद 2023 में मनीष सिसोदिया के जेल चले जाने पर आतिशी को मंत्री बनाया गया – और अब अरविंद केजरीवाल के जेल से छूटने के बाद वो महज चार साल में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ रही हैं|मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी आतिशी के कामकाज में कोई खास अंतर नहीं आने वाला है. फर्क बस इतना होगा कि अब वो  वो कैबिनेट की मीटिंग भी खुद ले सकेंगी और कोई भी फैसला लेने के लिए पहले की तरह अरविंद केजरीवाल की हस्ताक्षर का इंतजार नहीं करना होगा, लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि वो सब कुछ मनमाने तरीके से कर लेंगी – ये तो अभी से उनको साफ कर दिया गया है कि किसी भी मामले में नतीजे पर पहुंचने से पहले आतिशी को मंजूरी तो अरविंद केजरीवाल से लेनी ही होगी|

    कठपुतली मुख्यमंत्री कही डूबा तो नहीं देगी AAP  का साम्राज्य

    क्या आतिशी  ने चार साल में ही वो सारी ही खूबियां हासिल कर ली हैं, जिनकी अरविंद केजरीवाल को  दिल्ली विधानसभा चुनाव तक कदम कदम पर जरूरत पड़ने वाली है? जिस तरीके से अरविंद केजरीवाल की गैरमौैजूदगी में आतिशी ने आगे बढ़ कर मोर्चा संभाला | अरविंद केजरीवाल का हर जगह बचाव किया राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कड़े तेवर अपनाये रखा – और दिल्ली के उप राज्यपाल वीके सक्सेना और अफसरों अफसरों से दो-दो हाथ करती रहीं, साफ है कि आतिशी ने अरविंद केजरीवाल की नजर में खुद को परफेक्ट साबित कर दिया है| जी मेरे समझ से तो अरविन्द के नजर में परफेक्ट है तब ही उन्होंने अपने धर्म पत्नी सुनीता केजरीवाल , सिसोदिया , संजय सब को पछाड़ते आगे निकल गई , लेकिन इसमें थोड़ा ट्विस्ट है ,देखा जाये तो आतिशी की भूमिका तो रबर स्टांप सीएम वाली ही है, लेकिन रबर स्टांप जहां भी लगाना हो वहां ठीक से लगे, इसमें कोई शक नहीं होना चाहिये – आतिशी, अरविंद केजरीवाल के मन की हर बात को हकीकत में अमल में भी लाएंगी, इस बात की पूरी गारंटी लगती है, अरविन्द को बांकी औरो के लिए इसी बात का शक था , इसलिए आतिशी को प्रमुखता दी गई , और इसको आतिशी ने जल्द साबित भी कर दी अपने ऑफिस में 2 मुख्यमंत्री की कुर्सी लगवाकर |

    कठपुतली सीएम के अनेको फायदे

    आतिशी को दिल्ली  का मुख्यमंत्री बनाया जाना अरविंद केजरीवाल के लिए और भी फायदेमंद हो सकता था, अगर आम आदमी पार्टी के सारे नेता एक स्वर में उनकी वैलिडिटी नहीं समझा रहे  होते | देखते है  बीजेपी आगामी विधानसभा चुनाव में इस कठपुतली सरकार के कितने  फायदे उठा सकती है |

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  • बॉलीवुड और बोल्डनेस का जलवा

    भारतीय सभ्यता संस्कृति को ओल्ड फैशन बताना

    आजकल हमारे बॉलीवुड का पतन इतनी तेजी से हो रहा है ये बहुत ही गंभीर सवाल है| जब आप अध्यन करेंगे तो पता चलेगा की हमारे कलाकार खास कर महिला अभिनेत्रियां चुटकी में शोहरत की बुलंदियों को छू लेने के चक्कर में हमेशा भारतीय संस्कृति को ओल्ड फैशन बताकर वेस्टर्न कल्चर ( नंग पने )  को अपग्रेड करती रहती है |

    भारतीय सभ्यता संस्कृति को ओल्ड फैशन बताना  निर्माता निर्देशक की मनमानीग्लैमरस हसीनाओ का कहर  लेखक का मानसिक दिवालियापन

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    निर्माता निर्देशक की मनमानी

    फिल्म निर्माता फिल्म बनाते समय बहुत सी शर्ते रखते है। उन्ही शर्तो में से एक शर्त होती  है  की आपको फिल्म में बोल्ड दिखना है। दर्शको  को  रिझाने   के लिए छोटे कपड़े पहनना पड़ेगा , ताकि आप आकर्षण का मुख्य केंद्र लगो । दर्शक ज़्यादा आये और  फिल्म की कमाई ज़्यदा हो। अभिनेत्रियों को भी ये शर्ते बखूबी सूट करती है और उनके लिए आगे बढ़ने का इससे अच्छा मौका नहीं दिखता वो तो तैयार बैठी है कपडे उतार नंगे होने क लिए , बस उनका ध्यान सिर्फ फेमस और पैसे पर टिकी रहती है , इसलिए छोटे कपड़े पहनती है |

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    ग्लैमरस हसीनाओ का कहर

    फिल्मे आज कल चलती ही  है ग्लैमर की वजह से। आज के समय में दर्शको का टेस्ट भी उसी तरह का हो गया है। लेकिन  समाज में अभी भी सारे ठरकी छोकरो नहीं है ,  अभिनेत्रियों को यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए है की उनके बहुत से फोल्लोवेर्स होते है। देश में उनके चाहने बाले बहुत होते है। उनके छोटे कपड़े पहनने से देश और समाज में क्या फर्क पड़ेगा।

    अभिनेत्रियां पार्टी में आकर्षण का केंद्र बन के रहना चाहती है। इसलिए भी भी छोटे कपड़े पहनती है। परन्तु उनको यह बात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए है की छोटे कपड़े पहनने से आप सिर्फ आकर्षक ही दिखेगी।

    इसका एक बड़ा कारण है लोगों की दूषित व पतनकारी मानसिकता। वो ही फ़िल्म हिट होती है व मोटी कमाई करती है जिंनमे ऐसे अश्लील दृश्य दिखाए जाते है, जिनफे लोग टकटकी निगाहों से देखते रहते हैं ।

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    लेखक का मानसिक दिवालियापन

    पहले स्क्रिप्ट राइटर अपने ऊपर काम करते थे वो रिसर्च कर वो मुद्दे लाते जो समाज के लिए आईने का काम करता था | फिल्मे तो एक सामाजिक जागरूकता फ़ैलाने का एक माध्यम होता है ये हर वर्ग हर पीढ़ी के लोगो को प्रेरित करती रही है , परन्तु अब जिस तरह ये काम कर रहे है उसमे ज़्यदातर सन्देश रवायतों के खिलाफ है आज की फिल्मे वास्तविकता से बहुत दूर जा चुकी है | इसमें न सिर्फ नग्नता अश्लीलता परोसी जा रही है बल्कि नशेड़ी गुंडागर्दी चरित्रहीन बलात्कारी को नायक के रूप में पेश किया जा रहा है |

    मन के अंदर से देखकर इस रिश्तों का इल्जाम न दो,

    हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू,

    नूर की बूंद नहीं  है जो सदियों से बहा करती है,

    सिर्फ एहसास है ये रूह है  इसे  महसूस करो,

    प्यार को प्यार ही रहने दो कोई  और नाम न दो,

    हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू।

    shame

    shame

     सस्ती लोकप्रियता पाने, लोगों के दिलों दिमाग में पैठ करने का यह एक सस्ता जरिया बन गया है। आज कल एक्टिंग के नाम पर आप कितने मिनट तक अच्छे से अपने को- स्टार के होठो को चूस सकते हो | कितने  देर आप अपने को – स्टार को बेड पे सीन दे सकते हो| मुझे तो लगता है कुछ दिनों में बॉलीवुड  नेशनल चुम्बन अवार्ड भी देगी |

    आज से चार व पांच दशक पूर्व सेंसर बोर्ड की कैंची की धार बड़ी ही तीखी थी, इस प्रकार के दृश्यों को तत्काल काट दिया करती थी जो आज कल नाम मात्र की रह गयी है।

    लोगों ने कामुकता को प्यार का पर्याय समझ लिया है |

    सस्ती लोकप्रियता

    नाम

    दाम

    और

    काम

    प्राप्ति के लिए

    ये सब हो रहा है जो आने वाले हमरे पीढ़ियों को बर्बाद कर देगा इसलिए मैं सभी कलाकारों अभिनेत्रियों से अनुरोध करूँगा की ज़्यादा से ज़्यादा परदे में रहने दे पर्दा न उठाये |

  • आंदोलन छात्रों का, मुद्दा आरक्षण का, फिर हिन्दू टारगेट पर क्यों ?

    इस आंदोलन की मांग थी की आरक्षण ख़तम हो, की बांग्लादेश से हिन्दू ख़तम हो??

    मानवता को शर्मसार करती बांग्लादेशी उत्पाती गैंग

    मैं बेहद दुखी हु बांग्लादेश में हालात बेहद खराब हो चुके हैं। मेरी अंतरात्मा झक – झोर रही है की 21 वी सदी का विश्व किस ओर बढ़ रहा है , एक ओर जहाँ ” विश्व  शांति और  बंधुत्व ” का अनुपम मेल होना मांगता है, वहां ये क्या हो रहा ? चारो ओर  खून खराबा ही नजर आ रहा | पहले  सीरिया में ISIS ने कोहराम मचाया  फिर रूस यूक्रेन  युद्ध ने लाखो निर्दोष को अपने आगोश में ले लिया , थोड़े दिन पहले बांग्लादेश में जो हो रहा था उसकी जितनी निंदा की जाये कम है |

     जब से शेख हसीना ने इस्तीफा देकर देश छोड़ा है तब से ही उनकी पार्टी अवामी लीग के नेता और समर्थक इधर-उधर छिप पर अपनी जान बचा रहे हैं। इस बीच बांग्लादेश में हमलावरों के निशाने पर वहां के अल्पसंख्यक हिंदू हैं। हिंदुओं को टारगेट किया जा रहा है। उस वक्त से ही कई मंदिरों में आगजनी की घटनाएं सामने आ रही हैं। लगातार कट्टरपंथी आंदोलन के नाम पर हिंदुओं पर अत्याचार कर रहे हैं। बांग्लादेश में रहने वाले हिंदू सुरक्षित जगहों पर जाने की कोशिश कर रहे हैं। हिंदुओं के साथ-साथ हमलावर शेख हसीना की पार्टी के लोगों को भी अपना निशाना बना रहे हैं। मुझे ये समझ नहीं आ रहा आरक्षण के नाम पर ये आंदोलन शुरू हुआ और बांग्लादेश में  रह रहे हिन्दुओ को मारने, घर में आग लगाने और बहन बेटियों का बलात्कार करने लगे ???

    डरे हुए हैं अवामी पार्टी के समर्थक नेता 

    जब सत्तारूढ़ पार्टी अवामी लीग के समर्थक नेता इतने डरे हुए है की जब उन  लोगों से संपर्क किया जाता है  तो बहुत कम ही लोग बात करने को राजी होते हिम्मत काम करना बंद कर चूका है । लोगों में डर का माहौल है। कई लोगों ने अपना फोन ही बंद कर लिया है। जिन लोगों ने बात की उन्होंने अपनी लोकेशन बताने से इनकार कर दिया। एक शख्स ने बताया कि वो सुरक्षित जगह पर है लेकिन लगातार बुरी खबरें सुनने को मिल रही है |

    रंगपुर के छात्र लीग के बहुत से छात्रों  से बात की गई तो  बताया कि उन्हें  हमले से बचकर भागना पड़ा था। उन्होंने बताया कि यहां स्थिति बहुत खराब है। हमारे कई नेताओं को या तो मार दिया गया है या उनको किडनैप कर लिया गया है। मैं किसी तरह भागने में कामयाब रहा। मेरे घर पर हमला किया गया और तोड़फोड़ की गयी। गुंडों ने कब्जा कर लिया है। आगजनी और हत्या आम बात हो गई है। पुलिस कहीं नजर नहीं आ रही है। अब ये देखिये की छात्र भी जान बचाने में लगे हुए है तो आखिर ये आंदोलन चला कौन रहा ? ये बहुत बड़ा सवाल है |

    कई हिंदुओं के घरों मंदिरो में लगाई आग

    बांग्लादेश के कई शहरो से बड़ी डरावनी और मानवता को शर्मसार करने वाले वीडिओज़ आ रहे है , घरो में रहनेवाली माता बहनो का बलात्कार किया जा रहा , और बलात्कार करके उसे जान से मार दिया जा रहा है , उनके घरो में आग लगा दी जा रही है , मंदिरो, चर्च, गुरूद्वारे  सब पर हमला कर तोडा जा रहा है , इस आंदोलन की मांग थी की आरक्षण ख़तम हो न की बांग्लादेश से हिन्दू ख़तम हो , सुनने में आ रहा लोगो के कच्छे खोलकर चेक करके फिर मारा जा रहा | इससे बड़ा जघन्य क्या हो सकता , पता नहीं कहा छुपे बैठे है विश्व के शांति दूत , मुँह में दही जमाये बैठे है | लेकिन भारत को इसपर अबिलम्ब संज्ञान लेना चाहिए और विश्व फोरम पे आवाज़ उठानी चाहिए क्युकी हिन्दू हिंदुत्व और हिंदुस्तान का नारा है |

    हसीना के देश छोड़ने के बाद बढ़े अल्पसंख्यकों पर हमले

    हालांकि सेना प्रमुख के इस ऐलान से लोगों को थोड़ी राहत जरूर मिली है कि गुरुवार को नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार शपथ लेगी। लेकिन हसीना के सोमवार को पीएम पद से इस्तीफा देने और देश छोड़कर चले जाने के बाद से ही अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ गए हैं। पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ है, उसके बाद लोगों को सुरक्षित महसूस कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यह देश सबका है। कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना कानून प्रवर्तन एजेंसियों का कर्तव्य है। एक देश के तौर पर हमें इसके खिलाफ आवाज उठानी होगी।

    पहले हिंदुओं पर हमला, फिर घरों से लूटपाट

    ढाका में, प्रसिद्ध बांग्लादेशी लोक गायक राहुल आनंद के 140 साल पुराने किराए के घर पर हमला हुआ है। सोमवार को हथियारबंद लोगों की भीड़ ने घर पर धावा बोल दिया। भीड़ ने घर का दरवाजा तोड़ दिया, घर में तोड़फोड़ की और लूटपाट की। उन्होंने घर में आग भी लगा दी, जिससे 3,000 से ज्यादा वाद्य यंत्र जलकर खाक हो गए। इस घटना के बाद 48 वर्षीय गायक और उनका परिवार छिपने को मजबूर हो गया। वहीं भीड़ ने घर से जो कुछ भी मिल सकता था – फर्नीचर, दर्पण और अन्य कीमती सामान ले लिया और फिर वाद्ययंत्रों के कलेक्शन के साथ घर को आग लगा दी

    बांग्लादेश में महीनेभर पहले नौकरियों में आरक्षण को लेकर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक हो गया। ये आंदोलन हिंसा में तब्दील हो गया। शेख हसीना सरकार के खिलाफ विपक्ष भी खुलकर आंदोलन में कूद गया। शुरुआत में पुलिस और सेना ने सरकार का साथ दिया, लेकिन एक वक्त के बाद वो भी पीछे हट गए। आंदोलनकारी ढाका में स्थित पीएम हाउस में घुस गए। खूब तोड़फोड़ और लूटपाट की। यहाँ तक की PM  के घर के सारे सामान लूट लिए गए , उनके घरो की महिलाओ के अंगवस्त्र ( ब्रा , पैंटी ) हवा में लहराते हुए प्रदर्शन किया इससे बुरा और क्या हो सकता |  शेख हसीना ने इस्तीफा देकर देश छोड़ दिया। सेना ने अंतरिम सरकार का ऐलान किया। सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा समझ आता है। लेकिन इस सबमें अल्पसंख्यक हिंदू निशाना पर क्यों हैं? जिस तरह से हिंदू मंदिरों को टारगेट किया जा रहा उससे यही लगता है कि ये सोची समझी साजिश है। आंदोलन के बहाने कट्टरपंथियों को मौका मिल गया है और वो हिंदुओं पर निशाना साध रहे हैं।